स्कूल संचालक  खनिज या शराब माफिया नहीं, उनके साथ इस प्रकार का व्यवहार क्यों?

स्कूल संचालक  खनिज या शराब माफिया नहीं, उनके साथ इस प्रकार का व्यवहार क्यों?

जुलाई 27, 2024 - 01:50
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स्कूल संचालक  खनिज या शराब माफिया नहीं, उनके साथ इस प्रकार का व्यवहार क्यों?

(एसपीटी न्यूज नर्मदापुरम संतराम निशरेले प्रधान संपादक)

स्कूल संचालक  खनिज या शराब माफिया नहीं, उनके साथ इस प्रकार का व्यवहार क्यों?

गिरते पानी में जिले भर के कई स्कूल संचालक, मुजरिम की तरह खड़े रहे डी ई ओ कार्यालय में।

खाली पड़ी थी डी  ई ओ की कुर्सी कीं

नर्मदापुरम इटारसी //निजी रूप से स्कूल संचालित करने वाले स्कूल संचालक, क्या भूमि माफिया है,? खनिज माफिया है? शराब माफिया है? मादक पदार्थों के व्यापारी हैं या ड्रग्स माफिया ?
वह  तो स्कूल   के माध्यम से देश के भविष्य बच्चों को शिक्षित कर करने लगे हैं, फिर प्रशासनिक दवाब इन्हीं के ऊपर क्यों ,जिला शिक्षा विभाग  उन्हे कार्यालय  बुलाकर मुजरिम  की तरह घंटो  खड़े रखता है ,छोटे-छोटे मामलों में मान्यता समाप्त करने की धमकी देकर स्कूल संचालको पर मानसिक दवाब बनाता है, यह हम नही  कह रहे, यह कहना है उन स्कूल संचालकों का जो बच्चों को शिक्षित करने ,उनके भविष्य संवारने का  कार्य कर रहा है। जिला शिक्षा अधिकारी ने अभी जिले के 43 स्कूलों को नोटिस देकर उन्हें अपने दस्तावेजों के साथ 25 और 26 जुलाई को अपने कार्यालय में बुलाया था, लेकिन जिला शिक्षा अधिकारी वहां से नदारत थे ।गिरते पानी में जिले के कोने-कोने से  नदी नालों को पार करते हुए स्कूल संचालक जब जिला शिक्षा अधिकारी कार्यालय में पहुंचे तो वहां उनके साथ ऐसा व्यवहार किया जा रहा जैसे वह किसी बड़े अपराध के आरोपी हो ।स्कूल संचालको  ने  बताया की उन्हें सुबह 11:00 से समय दिया गया था फिर  भी वह 10:30 बजे ही अपनी फाइल लेकर गिरते पानी में नदी नालों को पार  करते हुए ,अपनी जान जोखिम  में डालकर यहां पर पहुंचे, लेकिन जिला शिक्षा अधिकारी यहां पर नहीं है। कार्यालय में बैठने की व्यवस्था भी नहीं है वह जहां तहा घंटो से खड़े  है, इनमें बहुत सी महिलाएं भी है। बनखेड़ी ,सोहागपुर, पिपरिया पचमढ़ी, इटारसी, सिवनी मालवा, डोलरिया, शोभापुर सेमरी,मखननगर आदि क्षेत्रों के स्कूल संचालक भारी बारिश में जिला शिक्षा कार्यालय में मौजूद थे, लेकिन वहां पर उनकी व्यथा सुनने वाला कोई नहीं उन्होंने बताया कि इसके पहले भी वह अपने स्कूल की संपूर्ण जानकारी,आनलाइन  और फाइलों के रूप में यहां जमा कर चुके हैं लेकिन कुछ ना कुछ कमी निकालकर उन्हें अपने दस्तावेज लेकर बुलाया गया है ।अब स्कूल संचालक सवाल करते हैं कि उन्होंने शिक्षा का क्षेत्र अपना कर क्या गुनाह किया है, शिक्षा विभाग के अधिकारी उन्हें इस प्रकार से क्यों परेशान कर रहे हैं, इधर जिले भर के जनप्रतिनिधि भी मौन है। स्कूल संचालक जो की शिक्षित बेरोजगारों को शिक्षक के रूप में  रोजगार देने के साथ ही बच्चों को शिक्षित करने का काम कर रहे हैं, उन्हें शिक्षा विभाग के अधिकारी परेशान कर रहे हैं ,यह  आरोप  स्कूल संचालकों का है।  स्कूल संचालकों ने बताया कि 26 जुलाई शुक्रवार को बड़ी संख्या में गिरते पानी में जिला शिक्षा कार्यालय पहुंचे, स्कूल संचालकों ने बताया कि सुबह 10:30 बजे यहां पर अपनी फाइल लेकर पहुंच गए हैं लेकिन उन्हें देखने  वाला कोई नहीं वहां बैठे बाबू कहते हैं कि,सर के आने के बाद फाइल देखी जाएगी,  कार्यालय में पदस्थ स्टाफ द्वारा भी द्वारा स्कूल संचालकों से ऐसा दुर्व्यवहार किया जा रहा है जैसे कि वह कोई माफिया हो। सोपास के जिला अध्यक्ष आलोक राजपूत का कहना है कि शिक्षा विभाग द्वारा नए कानून का हवाला देकर स्कूल संचालक को को बिना वजह  परेशान किया जा रहा है। सोपास के  प्रदेश पदाधिकारी आलोक गिरोटिया, जिला कार्यकारिणी सदस्य जफर सिद्दीकी का कहना है कि शिक्षा विभाग द्वारा सरकार के कानून की गलत व्याख्या कर स्कूल संचालकों को बेवजह परेशान किया जा रहा है ।
सोपास के इटारसी ब्लॉक अध्यक्ष निलेश जैन का कहना है कि शिक्षा विभाग को प्रशासन का सारा दबाव स्कूल संचालकों पर ही क्यों, उनका कहना है कि एक तो सरकार आरटीई की तहत प्राइवेट स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों की फीस दो, दो, तीन . तीन साल तक नहीं देता, तो वही दूसरी ओर जो अन्य बच्चे स्कूल में पढ़ते हैं, उनमें से कई बच्चों के बालक  साल भर  फीस नहीं देते हैं , वह जब उनसे फीस मांगो तो वह  जिला शिक्षा अधिकारी के पास पहुंच जाते हैं ,तो शिक्षा विभाग  और प्रशासन स्कूल संचालक से परीक्षा लेने और परीक्षा के बाद टीसी देने के लिए दवाब बनाते हैं। ऐसी स्थिति में निजी स्कूल संचालकों का स्कूल चलाना मुश्किल हो गया है, अनेक स्कूल संचालक भारी आर्थिक तंगी में है। उनका कहना है कि प्रशासन और शिक्षा विभाग को केवल स्कूल संचालकों द्वारा ली गई फीस का हिसाब ही दिखता है, लेकिन उनके द्वारा जो खर्च किए जाते हैं,जो पालक उनकी फीस रोक लेते हैं, लाखों रुपए उनकी फीस डूब जाती है, वह नहीं दिखाई देता। 
कुछ स्कूल संचालको ने यह भी सवाल उठाया की सरकारी स्कूलों में पढ़ाने वाले शिक्षक ,प्रोफेसर, प्रिंसिपल्स सरकार से हजारों रुपए वेतन लेते हैं लेकिन स्कूलों  से नदारत  रहते हैं,सरकारी स्कूलों में ग्रामीण क्षेत्र की स्थिति यह है कि वहां शिक्षक और प्राचार्य कभी समय पर  नहीं आते, कई जगह तो समय पर स्कूल भी नहीं खुलते, प्यून  ही सारा काम निपटाता है। पिछले दिनों संयुक्त संचालक शिक्षा, सहायक आयुक्त आदिवासी द्वारा जब शासकीय स्कूलों का निरीक्षण किया गया तो अनेक जगह ऐसी स्थितियां पाई गई की वहां पर या तो स्कूल ही नहीं खुला या स्कूल में 10 में से 8 शिक्षक गायब मिले ,कहीं प्रिंसिपल ही नहीं मिले तो आखिर सरकार जिला शिक्षा विभाग और जिला प्रशासन ऐसे शिक्षकों और प्रिंसिपलों पर कार्यवाही क्यों नहीं करता , सरकार का दबाव निजी स्कूलों पर ही क्यों? जबकि निजी स्कूल बच्चों को अच्छी शिक्षा देने में बेहतर कार्य कर रहे हैं, यह उनके रिजल्ट, परीक्षा परिणाम बताते हैं ।जबकि सरकारी स्कूलों में हजारों रुपए वेतन पाने वाले शिक्षक स्कूल से अधिकांश समय गायब रहते हैं ,उनका कहना है कि हम यह नहीं कह रहे हैं कि सारे सरकारी स्कूल के शिक्षक पढ़ाई नहीं करवाते, लेकिन अधिकांश सरकारी स्कूलों की स्थिति यही है ,वही अनेक सरकारी स्कूलों में सुविधा नहीं है,बारिश में क्लास में पानी टपकता है ,तो गर्मी में बच्चों के लिए पंखों की व्यवस्था भी नहीं है। जबकि निजी स्कूलों में हर प्रकार की सुविधा बच्चों को मिल जाती हैं और रिजल्ट भी उनके बेहतर होते हैं ,निजी स्कूल संचालकों कहना यह भी है कि वह सरकार की हर योजनाओं को में सहयोग करते हैं और सरकारी कार्यक्रमों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं ,सरकार की मंशा के अनुरूप कार्य करते हैं फिर उनके साथ इस प्रकार का व्यवहार क्यों? दरअसल स्कूल संचालक उन्हें शिक्षा माफिया कहे जाने से भी दुखी हैं। जिला शिक्षा अधिकारी और, जिला प्रशासन को भी  स्कूल संचालको  के प्रति मानवीय संवेदनाएं रखते हुए व्यवहार करना चाहिए।

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SPT News प्रधान संपादक संतराम निषेरेले जिला अध्यक्ष पत्रकार कल्यांण महासंध नर्मदापुरम 9407268810