जबावदारों की लाचारी, या नहीं निभा रहे जिम्मेदारी?

जबावदारों की लाचारी, या नहीं निभा रहे जिम्मेदारी?
नर्मदापुरम का न्यौता कोई भी आओ कहीं भी हाथ ठेला लगाओ, अपना व्यापार बढ़ाओ !!!
जबावदारों शहर को तो नहीं लजाओ, कुछ तो शर्म खाओ
(एसपीटी न्यूज़ नर्मदापुरम।संतराम निशरेले प्रदान संपादक )
नर्मदानगरी का जितना विकास होना चाहिए था वह नहीं हो सका है। यह तो सभी कहते हैं। क्यों नहीं हो सका। इसके अनेक कारण हैं। मुख्य रूप से जबावदारों ने अपनी जिम्मेदारी पर ध्यान नहीं दिया। इसी कारण यहां पर विकास के रास्ते रूकते रहे हैं। पहले बाबु आैर बाबाअों के नाम से शहर बदनाम था। अब हाथ ठेले वालों की भरमार है। प्राय: देखने में आता है कि यहां पर दूसरे स्थानों यहां तक कि दूसरे प्रांतों के लोगों ने आकर खुलेआम कहीं भी व्यवसाय करना शुरू कर दिया जिस पर जबावदारों ने कोई आपत्ति नहीं की। खासकर के हाथ ठेले वालों ने अपना सामराज्य बना लिया है। हर कहीं हाथ ठेले वाले या खोमचे वालों का व्यवसाय खूब फल फूल रहा है। उतने बढ़े और स्थायी दुकानदार ज्यादा मजे में नहीं है।
यहां पर दूसरे प्रांतों की बात करें तो राजस्थानियों ने अपना वर्चस्व बढ़ा लिया है। पहले यहां पर डमरू वाले, घंटी वाले, पंडा महाराज या ब्र्रजवासी वालों की मिठाई फेमस थी जो स्थानीय स्तर पर खूब पसंद की जाती थी। लेकिन अब उनकी जगह उनसे कहीं ज्यादा राजस्थान वालों ने नाम बना लिया है। हाथ ठेले वालों की बात की जाए तो इंदौरी पोहा, रतलामी सेव, हरयाणिवी जलेबी, आगरे का पेठा, तमाम नामों से फुलकी वाले शहर में विभिन्न नामों से व्यवसाय करने वालों की भरमार हो गई है। चाट वाले भी अन्य अनेक स्थानों से मनमर्जी के साथ हाथ ठेलों पर व्यवसाय कर रहे हैं। आईसक्रीम के हाथ ठेले अब तो उनके स्थान पर वाहनों में खानपान के स्टाल लग रहे हैं। इन स्टालों व हाथ ठेलों पर जमकर भीड़ देखी जाती है। चटपटे और तीखे मसालों की आड़ में ये लोग क्या परोस रहे हैं। यह देखने वाला कोई नहीं है। कहीं बीमारी तो नहीं परोस रहे यह कौन देखेगा? खास करके शहर की युवा पीढ़ी जो शारीरिक रूप से मजबूत होते हैं उन पर जल्दी बीमारी हावी नहीं होती वे इन दुकानों पर खूब चटकारे लेकर इन वस्तुओं की ग्राहकी बढ़ाने में योगदान कर रहे हैं। एक दूसरे को देखकर अनेक लोग प्रभावित होते हैं। ये लोग कौन सा तेल इस्तेमाल करते हैं। उनके पास किस प्रकार का मैदा होता है। जो सामग्री रहती है उसकी डेट कहीं एक्सपायरी तो नहीं है। इससे युवा पीढ़ी बेखबर रहती है। उन्हें तो तुरंत का स्वाद अच्छा लगना चाहिए। यदि बीमार होंगे तो शहर में डाक्टरों की संख्या भी बढ़ती जा रही है।
चल पडा है किराये की दुकानों का धंधा
इस खोमचे और हाथ ठेले के व्यवसाय में कुछ चालाक किस्म के लोगों का भी विशेष हाथ है जिन्होंने अपनी होशियारी की दम पर जगह घेर कर दुकान के लिए जगह हथिया ली है उस जगह या टप को किराये से चला रहे हैं। यदि जिसकी दुकान है उसका आधार कार्ड और फोटो दुकान पर लगवाना अनिवार्य किया जाए तो अनेक दुकानदार किरायेदार निकलेंगे।
प्रशासन वाले तो मुसाफिर हैं
यदि यह मान लिया जाए कि प्रशासन वाले गड़बड़ी देखेंगे तो उन्हें क्या करना वे तो नौकरी करने आए हैंं उन्हें समय पास करना है। आज इस शहर में कल कहीं और चले जाएंगे सैंकडों आए और चले गए। लेकिन जिनको जनप्रतिनिधि कहा जाता है वे जो जनता के सेवक कहलाते हैं उनको जनता के स्वास्थ्य का ख्याल रखना चाहिए लेकिन उनके पास भी यह जबाव है कि जो लोग खुद के स्वास्थ्य का ध्यान नहीं रखना चाहते हैं तो जनप्रतिनिधि क्यों रखें?
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